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khud ko khojne ka safar

Monday, November 29, 2010

मेरे हिस्से का सूरज ..



तुमसे मिलना ,
एक अजीब इतफाक था
अँधेरे मे गूम होते
मेरे अस्तित्व
को एक सूरज तुमने दिया था
जिसकी रौशनी मे
मैंने खुद को जाना
जीवन ख़तम नहीं हुआ
इस बात को भी पहचाना
अजीब मंज़र था वो भी
अपना हाल
किसी को भी न सुनाने वाली लड़की
एक अजनबी के सामने
तार तार होके बिखर गयी थी
तुमने बहुत ख़ामोशी
से सबकुछ सुना था
तुम्हरी मदद से
मैंने वापस जिंदगी का
ताना बाना बुना था
तुम्हारा  संतावना देता स्पर्श
आज भी महसूस करती हूँ
आज भी जब भी अँधेरा होता है
वो सूरज रोशन करता है जीवन
जो तुमने मुझे दिया था
तब मैंने जाना था
एक पुरुष और स्त्री
का सम्बन्ध
ऐसा  भी हो सकता है
अगर इसे नाम देना
जरुरी हो तो
कह सकती हूँ
तुम हो
मेरे हिस्से का सूरज .

33 comments:

  1. manjula ji, kya kahoon shabd hi nahin hain mere paas...
    bahut hi sundar lekhan... badhayi.....


    मुट्ठी भर आसमान...

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  2. अगर इसे नाम देना जरुरी हो तो कह सकती हूँ
    तुम हो मेरे हिस्से का सूरज.
    बहुत बढिया रचना. सुन्दर प्रस्तुति. शब्दों का शानदार सफर.

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  3. मंजुला जी बहुत ही सुन्दर कविता लिखी है आपने ,हमसभी को अपने जीवन में इक ऐसे सूरज की तलाश हमेशा होती है जो हमारे मनके अंधियारों से हमें मुक्त करे आपने उस सूरज को अपने हिस्से का सूरज कह करउस सूरज का भी मान बढाया है और सूरज के कारण कविता में चार चाँद लग गए हैं बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति

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  4. तुमने बहुत ख़ामोशी
    से सबकुछ सुना था
    तुम्हरी मदद से
    मैंने वापस जिंदगी का
    ताना बाना बुना था
    तुम्हारा संतावना देता स्पर्श
    आज भी महसूस करती हूँ
    आज भी जब भी अँधेरा होता है
    वो सूरज रोशन करता है जीवन
    जो तुमने मुझे दिया था
    तब मैंने जाना था
    एक पुरुष और स्त्री
    का सम्बन्ध
    ऐसा भी हो सकता है
    अगर इसे नाम देना
    जरुरी हो तो
    कह सकती हूँ
    तुम हो
    मेरे हिस्से का सूरज

    आपकी उपर्युक्त पंक्तियों में कविता की जान बसी है.
    अहा,क्या बात है

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  5. मंजुला जी आपके ब्लॉग पर पहली बार आया.. आपकी कविता जीवन और सम्भावना से भरी है.. सुन्दर रचना है आपके हिस्से का सूरज.. आप सरल शब्दों में गहरी बात कहने की क्षमता रखती हैं..

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  6. तुमने बहुत ख़ामोशी
    से सबकुछ सुना था
    तुम्हरी मदद से
    मैंने वापस जिंदगी का
    ताना बाना बुना था
    तुम्हारा संतावना देता स्पर्श
    आज भी महसूस करती हूँ
    आज भी जब भी अँधेरा होता है
    वो सूरज रोशन करता है जीवन
    जो तुमने मुझे दिया था
    तब मैंने जाना था
    एक पुरुष और स्त्री
    का सम्बन्ध
    ऐसा भी हो सकता है
    अगर इसे नाम देना
    जरुरी हो तो
    कह सकती हूँ
    तुम हो
    मेरे हिस्से का सूरज ...........

    मंजुला जी आपके ब्लॉग पर पहली बार आया हूँ .......
    सुन्दर रचना ..........

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  7. अशोक मिश्र जी ,अरुण चन्द्र राइ साहब ,ममताजी ,कुंवर जी ,मेरे ब्लॉग तक आने के लिए व हौसला आफजाई के लिए बहुत बहुत शुक्रिया ...आप आगे भी आते रहे मार्गदर्शन करे यही आशा है ....
    धन्यवाद
    मंजुला

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  8. अँधेरे मे गूम होते
    मेरे अस्तित्व
    को एक सूरज तुमने दिया था
    जिसकी रौशनी मे
    मैंने खुद को जाना
    गहन भावों से ओत प्रोत रचना ...बहुत खूब
    चलते -चलते पर आपका स्वागत है

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  9. मंजुला जी बहुत ही सुन्दर कविता लिखी है आपने

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  10. तुमसे मिलना ,
    एक अजीब इतफाक था
    अँधेरे मे गूम होते
    मेरे अस्तित्व
    को एक सूरज तुमने दिया था
    बहुत ही सुंदर ....... एक एक पंक्तियों ने मन को छू लिया ...
    बहुत देर से पहुँच पाया .......माफी चाहता हूँ..

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  11. उम्दा प्रस्तुति.

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  12. awwww........sooooooo sweet....kinni acchi nazm hai, bohot khoobsurat hai manjula ji, bohot accha laga aapko padhkar

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  13. sabhi logo ka bahut bahut sukriya ...mere blog tak aane ke liye...

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  14. बहुत उम्दा अभिव्यक्ति!

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  15. ek behad acche ant ne kavita ko raushan kar diya hai ...shubhkamnayen...

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  16. बहुत ही सुंदर तरीके से प्रस्तुत किया गया है। मेरे पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा।

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  17. मैंने अपना पुराना ब्लॉग खो दिया है..
    कृपया मेरे नए ब्लॉग को फोलो करें... मेरा नया बसेरा.......

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  18. ह्र्दय्स्पर्षी सुन्दर रचना ! मेरे ब्लोग पर भी आएं व फ़ोलो करें !

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  19. अच्छी रचना लफ्जो का सुंदर उपयोग !
    मेरे ब्लॉग में SMS की दुनिया .........

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  20. आप की रचनाये मार्मिकता से ओत प्रोत है

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  21. अति सुंदर रचना है .

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  22. bahut hi sundar rachna..

    mere blog par bhi sawagat hai..
    Lyrics Mantra
    thankyou

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  23. .

    प्रिय मंजुला ,

    मेरा भी सफ़र जारी है , खुद को खोजने का। हर पल बदलते रिश्ते और नए नए अनुभव इस सफ़र को अग्नि-परीक्षा जैसा बना देते हैं।
    इस बहतरीन प्रस्तुति के लिए आभार।
    दिव्या।

    .

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  24. हिस्से के सूरज या
    सूरज ।
    प्रशंसनीय रचना ।

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  25. आदरणीय मंजुला जी
    तुमसे मिलना ,
    एक अजीब इतफाक था

    बहुत सुन्दर कविता

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  26. आप से निवेदन है कि मेरी पोस्ट "जानिए पासपोर्ट बनवाने के लिए हर जरूरी बात" देखियेगा और अपने अनुपम विचारों से हमारा मार्गदर्शन करें.
    आप भी सादर आमंत्रित हैं,
    http://sawaisinghrajprohit.blogspot.com पर आकर
    हमारा हौसला बढाऐ और हमें भी धन्य करें .......आपका अपना

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  27. सुन्दर भाव !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  28. wah.itni komalta se likhi hai aapne ki kahne ko shabd hi nahin.

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