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khud ko khojne ka safar

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Monday, April 30, 2012

स्वप्न जो सच सा है
















कशमकश बहुत है
मन के अन्दर
खोज खुद की
इतनी  आसन तो नहीं
इस कोशिश मे
लगता है
कुछ छुट सा रहा है
जिसको शायद मै
जाने नहीं दे सकती
प्रश्नचिंह सा लगा देता है मन
बहुत सी कोशिशो  को
बहुत मजबूती से जमे
संस्कार भी रास्ता रोक लेते हैं
फिर भी एक अजीब सा
आकर्षण है
जो मुझे खिचता है
पूरे वेग से
अपनी और
पता नहीं क्या है
भविष्य की मुट्ठी मे
मेरे लिए
फिर भी  चाहती हु
इस पथ पर चलते  जाना
जब तक अर्थ न पा लू
इस जीवन का
या फिर जान सकू
उस रहस्य को
जिसे
आत्मा साक्षात्कार
कहा जाता है .















(चित्र गूगल से साभार )

Thursday, December 1, 2011

 


















ए हवा तू किस  शहर से आती है ?
क्यों तेरी हर लहर से उसकी महक आती है .

सबकुछ महफूज़ करने की मेरी तमाम  कोशिशे ,

उस एक झोंके से फिर से बिखर  जाती है .

मेरी खुशनुमा जिंदगी सिहर उठती है उस पल,

जब तेरे कण कण से उसकी बददुआ  की बू आती है

क्या फिर से उसने दी है मुझे बर्बाद होने की दुआ ?

क्यों तेरी हर लहर से मुझे खंजर की बू आती है .

Thursday, June 30, 2011

                          
                          दर्पण विश्वास का
                                       चूर हुआ जब                                                                      आहात हुआ मन 
         बदल गया सारा ही जीवन 
                               
                         कोई ओर नहीं छोर नहीं   
                                 सुलझाऊ कैसे  
                                   बुरी तरह 
                          उलझे हुए धागे सा जीवन 
   
                             बहुत सन्नाटा है हर तरफ                   
                                    संवाद खुद से 
                                  भी हुआ मुस्किल 
                              ठहर सा गया है जीवन 

Friday, March 18, 2011

एक संकल्प इस होली मे ....

फीकी पड़ चुकी है 
मन की चादर
सोचा इस होली मे 
कुछ नए रंग भरू
हरे नीले लाल के संग
कोमल गुलाबी रंग भी भरू
कोशिश की 
पर कुछ हो न पाया 
कोई भी रंग चढ़ न पाया 
कारण खोजा तो जाना
आस पास फैले भ्रस्ट्राचार ,अनाचार 
नित होते घोटालो ने 
सारे मन आकाश को ढक डाला 
सारा अंतर्मन काला कर डाला 
तभी कोई रंग 
उसपर चढ़ नही पाया 
अपने अपने दयारे मे कैद
कब तक घुटेगे इस तरह ?
आईये एकजूट होकर 
इन अव्यवस्ताओ से लडे
बड़ा काम न सही 
आस पास की गंदगी 
को ही साफ़ करे 
दाग लगा रहे जो समाज, देश को 
ऐसे शख्स को नज़रंदाज़ न करे 
व कभी न  माफ़ करे 
छोड़ कर निजी लड़ाई
देश हित मे काम करे 
ताकि फिर से 
काले पड़ चुके मन आकाश पर 
लाल,पीले हरे ,गुलाबी 
सारे के सारे रंग भर सके . 

Thursday, December 23, 2010

मेरा घर मेरे लोग ...

आज कुछ लिखने का मन हुआ ,अभी कुछ दिनों से मै अपने दादाजी के घर गयी हुई थी जोकि पटना से कोई 20  किलोमीटर की दुरी पर है ,असल मे मेरे चाचाजी के बेटे की शादी थी ,मेरे पिताजी भेल भोपाल मे जॉब के चलते भोपाल मे ही बस गए थे ,हमारा वो पुस्तैनी घर से रिश्ता बस शादी या कोई दुर्घटना के समय पहुच जाना जितना ही रह गया था ...फिर मेरी शादी के बाद ये सिलसिला भी मेरे हाथ से चला गया था ,अब जब ये मौका मिला घर खानदान की आखरी शादी मे शामिल होने का तो मै खासी उत्साहित थी ट्रेन मे बैठे बैठे सारे पल बचपन के जो हमने वहां बिताये थे आँखों के सामने घुमने  लगे ,वहां कुछ दिन बिताने के बाद मेरा सारा उत्साह ठंडा पड चूका था ..फिर जो कविता निकली मन से वो आपसे शेयर कर रही हूँ .


    
   

बरसो बाद 
अपने घर लौटना हुआ         
अजीब सी ख़ुशी थी
पलके भीगी हुई थी                                                         
सबने गले लगाया 
कुछ उलाहना भी दिया 
फिर कुछ घंटो मे ही 
अनुमान हो गया 
जिस चीज़ की खोज 
मुझे यहाँ लायी थी 
वो लगाव  तो कहीं खो  गया 
उनके चेहरों  पर था एक डर 
अनजाना सा 
समझ पाई तब जाना 
उन्हें लगा था मै कहीं 
उस जायजाद की बात न करू 
जो मेरे पिता ने कभी मागी नहीं 
तब मुझे अहसास हुआ 
बचपन मै जो आंगन 
बहुत बड़ा हुआ करता था 
हम ढेर सारे भाई बहन 
को अपनी गोद मै लिए 
खिलखिलाता था 
आज अचानक मुझे 
छोटा छोटा क्यों लगा 
मन ही मन मै मुस्कुराई 
बहुत देर से ही सही  
मै ये गूढ़ रहस्य समझ  तो पाई 
घर बड़ा या छोटा नहीं होता 
उनमे रहने वाले 
उसे छोटा करते या विस्तार देते है 
प्यार ,यादे ,रिश्ते भी जायदाद है 
कभी कभी बड़े भी नही समझ पाते हैं 
मै अपना हिस्सा अपने साथ ले आई....
अपनी बचपन की सारी यादो को 
समेटकर  मै वापस चली आई 

Monday, November 29, 2010

मेरे हिस्से का सूरज ..



तुमसे मिलना ,
एक अजीब इतफाक था
अँधेरे मे गूम होते
मेरे अस्तित्व
को एक सूरज तुमने दिया था
जिसकी रौशनी मे
मैंने खुद को जाना
जीवन ख़तम नहीं हुआ
इस बात को भी पहचाना
अजीब मंज़र था वो भी
अपना हाल
किसी को भी न सुनाने वाली लड़की
एक अजनबी के सामने
तार तार होके बिखर गयी थी
तुमने बहुत ख़ामोशी
से सबकुछ सुना था
तुम्हरी मदद से
मैंने वापस जिंदगी का
ताना बाना बुना था
तुम्हारा  संतावना देता स्पर्श
आज भी महसूस करती हूँ
आज भी जब भी अँधेरा होता है
वो सूरज रोशन करता है जीवन
जो तुमने मुझे दिया था
तब मैंने जाना था
एक पुरुष और स्त्री
का सम्बन्ध
ऐसा  भी हो सकता है
अगर इसे नाम देना
जरुरी हो तो
कह सकती हूँ
तुम हो
मेरे हिस्से का सूरज .

Tuesday, November 23, 2010

तेरे साथ का वादा












तुम बिन जीवन मे
 एक अजीब सी कमी है .
जैसे खुशबू ही न हो जीवन मे  ,
भले ही वो फूल सी खिली है .
तुम जो साथ होते हो ,
अजब चमत्कार होता है .
मंजिल तक जाकर लगता है ऐसा,
जैसे मै नहीं मंजिल मेरे पास तक चली है .
रास्ता पता है तो भी क्या ,
तुम साथ आओगे  इसलिए रुकी हूँ  .
तुम साथ होकर भी साथ हो या न हो ?
बस ये प्रश्न पर मै उम्र भर ढगी हूँ .
उगते हुए सूरज का नर्म उजाला ,
आकर्षित करता है तो क्या .
सिर्फ तेरे साथ का वादा हो तो ,
मै अंधेरो मै ही भली हूँ.