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khud ko khojne ka safar

Thursday, August 19, 2010

जीवन तेरे रूप अनेक

कभी उदासी की छाव
कभी खुशी की धुप
बहुत हैरान करते हैं
पल पल बदलते जीवन के रूप


टूट कर जुड़ना
जुड़ के फिर से टूटना
जब तक सांस चलती है
ये क्रम चलता है

कभी आपका होना
निरर्थक सा लगता है
कभी आपके अपने
उसे अर्थपूर्ण बना देते हैं

हजरों लोगो से रोज़ मिलना
जिंदगी का हिस्सा है
कभी तन्हाई माय खुद से भी मिलना
अच्छा लगता है .

शूभ दिन
मंजुला

5 comments:

  1. बहुत अच्छी कविता।

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  2. manjulaa , tumhaare vichaar bahut sundar hai inhen duniyaan ki najar naa lage yahi kaamanaa hai

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  3. Manjula ji, aapke ideas bahut achhe hain, inme jeevan ki mithas aur kadvahat dono chhipi hain. Aap yun hi likhte rahiye plz.

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