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khud ko khojne ka safar

Thursday, May 22, 2014

फिर एक कोशिश कुछ लिखने की










शिकायत बहुत थी की 
ठहरी सी है ज़िन्दगी
कुछ ऐसी  हलचल हुई कि
सबकुछ धुन्दला  सा गया 
अब वापस इंतज़ार है 
लहरो के शांत हो जाने का 
ताकि फिर समझ सकू 
कि आगे क्या है ज़िन्दगी के 
पिटारे मे मेरे लिए 
फिर कोई नई उम्मीदी ?
या फिर एक नया सवेरा 
या फिर फिर एक सफर 
बेनाम सा ,बेमतलब सा 
कभी कभी लगता है 
ठोस जमीन कि मेरी तलाश 
सिर्फ तलाश ही बन के  रह जाए
हमेशा कि तरह ..






3 comments:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज के ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है...

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  2. बहुत सुन्दर लिखा है..

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  3. लाजवाब अहसास..बेहतरीन भावपूर्ण नज़्म..आभार

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