शिकायत बहुत थी की ठहरी सी है ज़िन्दगी कुछ ऐसी हलचल हुई कि सबकुछ धुन्दला सा गया अब वापस इंतज़ार है लहरो के शांत हो जाने का ताकि फिर समझ सकू कि आगे क्या है ज़िन्दगी के पिटारे मे मेरे लिए फिर कोई नई उम्मीदी ? या फिर एक नया सवेरा या फिर फिर एक सफर बेनाम सा ,बेमतलब सा कभी कभी लगता है ठोस जमीन कि मेरी तलाश सिर्फ तलाश ही बन के रह जाए हमेशा कि तरह ..