हजरों लोगो से रोज़ मिलना जिंदगी का हिस्सा है कभी तन्हाई मे खुद से भी मिलना अच्छा लगता है .
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khud ko khojne ka safar
Thursday, June 30, 2011
Friday, March 18, 2011
एक संकल्प इस होली मे ....
फीकी पड़ चुकी है
मन की चादर
सोचा इस होली मे
कुछ नए रंग भरू
हरे नीले लाल के संग
कोमल गुलाबी रंग भी भरू
कोशिश की
पर कुछ हो न पाया
कोई भी रंग चढ़ न पाया
कारण खोजा तो जाना
आस पास फैले भ्रस्ट्राचार ,अनाचार
नित होते घोटालो ने
सारे मन आकाश को ढक डाला
सारा अंतर्मन काला कर डाला
तभी कोई रंग
उसपर चढ़ नही पाया
अपने अपने दयारे मे कैद
कब तक घुटेगे इस तरह ?
आईये एकजूट होकर
इन अव्यवस्ताओ से लडे
बड़ा काम न सही
आस पास की गंदगी
को ही साफ़ करे
दाग लगा रहे जो समाज, देश को
ऐसे शख्स को नज़रंदाज़ न करे
व कभी न माफ़ करे
छोड़ कर निजी लड़ाई
देश हित मे काम करे
ताकि फिर से
काले पड़ चुके मन आकाश पर
लाल,पीले हरे ,गुलाबी
सारे के सारे रंग भर सके .
मन की चादर
सोचा इस होली मे
कुछ नए रंग भरू
हरे नीले लाल के संग
कोमल गुलाबी रंग भी भरू
कोशिश की
पर कुछ हो न पाया
कोई भी रंग चढ़ न पाया
कारण खोजा तो जाना
आस पास फैले भ्रस्ट्राचार ,अनाचार
नित होते घोटालो ने
सारे मन आकाश को ढक डाला
सारा अंतर्मन काला कर डाला
तभी कोई रंग
उसपर चढ़ नही पाया
अपने अपने दयारे मे कैद
कब तक घुटेगे इस तरह ?
आईये एकजूट होकर
इन अव्यवस्ताओ से लडे
बड़ा काम न सही
आस पास की गंदगी
को ही साफ़ करे
दाग लगा रहे जो समाज, देश को
ऐसे शख्स को नज़रंदाज़ न करे
व कभी न माफ़ करे
छोड़ कर निजी लड़ाई
देश हित मे काम करे
ताकि फिर से
काले पड़ चुके मन आकाश पर
लाल,पीले हरे ,गुलाबी
सारे के सारे रंग भर सके .
Thursday, December 23, 2010
मेरा घर मेरे लोग ...
आज कुछ लिखने का मन हुआ ,अभी कुछ दिनों से मै अपने दादाजी के घर गयी हुई थी जोकि पटना से कोई 20 किलोमीटर की दुरी पर है ,असल मे मेरे चाचाजी के बेटे की शादी थी ,मेरे पिताजी भेल भोपाल मे जॉब के चलते भोपाल मे ही बस गए थे ,हमारा वो पुस्तैनी घर से रिश्ता बस शादी या कोई दुर्घटना के समय पहुच जाना जितना ही रह गया था ...फिर मेरी शादी के बाद ये सिलसिला भी मेरे हाथ से चला गया था ,अब जब ये मौका मिला घर खानदान की आखरी शादी मे शामिल होने का तो मै खासी उत्साहित थी ट्रेन मे बैठे बैठे सारे पल बचपन के जो हमने वहां बिताये थे आँखों के सामने घुमने लगे ,वहां कुछ दिन बिताने के बाद मेरा सारा उत्साह ठंडा पड चूका था ..फिर जो कविता निकली मन से वो आपसे शेयर कर रही हूँ .
बरसो बाद
अपने घर लौटना हुआ
अजीब सी ख़ुशी थी
पलके भीगी हुई थी
सबने गले लगाया
कुछ उलाहना भी दिया
फिर कुछ घंटो मे ही
अनुमान हो गया
जिस चीज़ की खोज
मुझे यहाँ लायी थी
वो लगाव तो कहीं खो गया
उनके चेहरों पर था एक डर
अनजाना सा
समझ पाई तब जाना
उन्हें लगा था मै कहीं
उस जायजाद की बात न करू
जो मेरे पिता ने कभी मागी नहीं
तब मुझे अहसास हुआ
बचपन मै जो आंगन
बहुत बड़ा हुआ करता था
हम ढेर सारे भाई बहन
को अपनी गोद मै लिए
खिलखिलाता था
आज अचानक मुझे
छोटा छोटा क्यों लगा
मन ही मन मै मुस्कुराई
बहुत देर से ही सही
मै ये गूढ़ रहस्य समझ तो पाई
घर बड़ा या छोटा नहीं होता
उनमे रहने वाले
उसे छोटा करते या विस्तार देते है
प्यार ,यादे ,रिश्ते भी जायदाद है
कभी कभी बड़े भी नही समझ पाते हैं
मै अपना हिस्सा अपने साथ ले आई....
अपनी बचपन की सारी यादो को
समेटकर मै वापस चली आई
बरसो बाद
अपने घर लौटना हुआ
अजीब सी ख़ुशी थी
पलके भीगी हुई थी
सबने गले लगाया
कुछ उलाहना भी दिया
फिर कुछ घंटो मे ही
अनुमान हो गया
जिस चीज़ की खोज
मुझे यहाँ लायी थी
वो लगाव तो कहीं खो गया
उनके चेहरों पर था एक डर
अनजाना सा
समझ पाई तब जाना
उन्हें लगा था मै कहीं
उस जायजाद की बात न करू
जो मेरे पिता ने कभी मागी नहीं
तब मुझे अहसास हुआ
बचपन मै जो आंगन
बहुत बड़ा हुआ करता था
हम ढेर सारे भाई बहन
को अपनी गोद मै लिए
खिलखिलाता था
आज अचानक मुझे
छोटा छोटा क्यों लगा
मन ही मन मै मुस्कुराई
बहुत देर से ही सही
मै ये गूढ़ रहस्य समझ तो पाई
घर बड़ा या छोटा नहीं होता
उनमे रहने वाले
उसे छोटा करते या विस्तार देते है
प्यार ,यादे ,रिश्ते भी जायदाद है
कभी कभी बड़े भी नही समझ पाते हैं
मै अपना हिस्सा अपने साथ ले आई....
अपनी बचपन की सारी यादो को
समेटकर मै वापस चली आई
Monday, November 29, 2010
मेरे हिस्से का सूरज ..
तुमसे मिलना ,
एक अजीब इतफाक था
अँधेरे मे गूम होते
मेरे अस्तित्व
को एक सूरज तुमने दिया था
जिसकी रौशनी मे
मैंने खुद को जाना
जीवन ख़तम नहीं हुआ
इस बात को भी पहचाना
अजीब मंज़र था वो भी
अपना हाल
किसी को भी न सुनाने वाली लड़की
एक अजनबी के सामने
तार तार होके बिखर गयी थी
तुमने बहुत ख़ामोशी
से सबकुछ सुना था
तुम्हरी मदद से
मैंने वापस जिंदगी का
ताना बाना बुना था
तुम्हारा संतावना देता स्पर्श
आज भी महसूस करती हूँ
आज भी जब भी अँधेरा होता है
वो सूरज रोशन करता है जीवन
जो तुमने मुझे दिया था
तब मैंने जाना था
एक पुरुष और स्त्री
का सम्बन्ध
ऐसा भी हो सकता है
अगर इसे नाम देना
जरुरी हो तो
कह सकती हूँ
तुम हो
मेरे हिस्से का सूरज .
Tuesday, November 23, 2010
तेरे साथ का वादा
एक अजीब सी कमी है .
जैसे खुशबू ही न हो जीवन मे ,
भले ही वो फूल सी खिली है .
तुम जो साथ होते हो ,
अजब चमत्कार होता है .
मंजिल तक जाकर लगता है ऐसा,
जैसे मै नहीं मंजिल मेरे पास तक चली है .
रास्ता पता है तो भी क्या ,
तुम साथ आओगे इसलिए रुकी हूँ .
तुम साथ होकर भी साथ हो या न हो ?
बस ये प्रश्न पर मै उम्र भर ढगी हूँ .
उगते हुए सूरज का नर्म उजाला ,
आकर्षित करता है तो क्या .
सिर्फ तेरे साथ का वादा हो तो ,
मै अंधेरो मै ही भली हूँ.
Thursday, October 28, 2010
ये जिन्दगी एक इम्तिहान
नर्म मुलायम सी
खुबसूरत सी दिखती है जिन्दगी,
भीतर गर्म लावे सी पिघलती है
पल पल ये जिंदगी ,
मौहौल है मैला मैला सा
हर इंसान है भटका भटका सा,
किस से क्या उम्मीद करूँ
हर तरफ है मायूसी ,
हर चेहरे पर है बेचारगी
हालात ऐसे ही बनाती है जिंदगी,
एतबार जो बहुत था खुद पर
कतरा कतरा बिखर गया,
जाना था किस राह मुझे
कहाँ ले आई मुझे ये जि,न्दगी
गिर के फिर से उठ कर
चलने की जिद करती हूँ,
खीचने को वापस गर्त मे
मचलती है जिंदगी.
मुझे भी जिद है बर्बाद होने की
रोकने से रुकुगी नहीं,
ले ले कितने भी
इम्तिहान ये जिन्दगी.
(चित्र गूगल से साभार )
.
Thursday, October 7, 2010
प्रकृति की पुकार सुनो.......

आज मे खिड़की पर खड़ी थी
तेज़ी से भागते यातायात व
आते जाते लोगो को देख रही थी
तभी मेरी नज़र
अपने बगीचे के पेड़ पौधों पर पड़ी
लगा जैसे वो शिकायत कर रहे हैं
और नाराज़गी से घुर रहे है
जैसे कह रहे हो
अब तुम्हरे पास हमारे लिए वक्त ही नहीं है
पहले रोज़ प्यार से सींचा दुलारा करती थी
घंटो निहारा करती थी
जेहन पर एक झटका सा लगा
वाकई मे जीवन की भाग दौड़
प्रकृति से दूर करती जा रही है
और हमें अहसास तक नहीं है
तभी प्रकृति को रौद्र रूप मे
आना पड़ता है
कभी सुनामी बनकर
तो कभी हमारी बुनियाद को हिला कर
अपने होने का अहसास करना पड़ता है
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